जज़्बा-ऐ-तन्हाई

मेरे ब्लॉग के सभी पाठकों को पीयूष राज सख्त जानी का तह--दील से आदाब--सलाम। आप सभी का बहुत बहुत खैर मकतम करते हुए मैं आपसे सभी के दरम्यान अपना एक छोटा सा कलाम पेश कर रहा हूँ। ये शायरी उन दिलों की है जिन्हे मैं अपने जिन्दगी के सबसे काले दीनों में शुमार करता हूँ। अर्ज़ कीया है :

जिन्दगी ग़म की एक सौगात नई लाती है ,
रोज़ मरकर भी मुझे मौत नहीं आती है

आँख मीचे मैं करवटें बदलता रहता हूँ ,
अब तों नींद भी किश्तों में ही मिल पाती है

जीन निगाहों में बसी थी कभी सूरत मेरी ,
गर मेरी ऑर भी देखे तो पलट जाती है

रोज़ रोंज़े रखे थे मैंने भी कल तक दील से ,
आज तो ईद मुहर्रम सी नज़र आती है

कल जहाँ तक थे मेरे नाम के चर्चे "सख्तु ",
मेरे ही नाम से हर शाम जवाँ होती थी

बाग़ वो अहद का ख़ुद ही तो उजाड़ा मैंने ,
जिस्के हर फूल से खुशबू मेरी ही आती थी

ग़म गुसारों की बेवफाई से रूस्वा होके ,
जब कभी भी आँख छलछलाती है ,

रोके खुदपर कभी वीराने में ,
चश्म - -शम्मा शब - -रोज़ बुझ सी जाती है

आपका अपना,
सुखनवर
सख्त जानी

Comments

  1. nice poetry!

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  2. hmmm...gud job...:)

    pata hai its a god's gift if u can express ur heart thru words...aur is tarah se likhna ki dusre samajh sake...jaise wo khud ki hi feeling ho...jaise wo padhne wale ke hi shabd ho...hats off to u...

    u hv words for urself..u hv words for others...keep it up...i really appreciate this quality of urs coz i lost mine...:)

    बाग़ वो अहद का ख़ुद ही तो उजाड़ा मैंने ,
    ye line tumpe suit nai karti sakht...jo hona hota hai wo hota hi hai..bahana koi ban jata hai..

    hope u can sing it like jagjeet singh...:D

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  3. Thanks Amrit!!

    I hope you like others as well....Keep posting!

    ReplyDelete

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